अध्याय 6: ध्यानयोग

भगवद् गीता अध्याय 6, श्लोक 10

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संस्कृत श्लोक

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।

एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः॥

हिंदी अर्थ

मन और इन्द्रियों सहित शरीर को वश में रखने वाला, आशारहित और संग्रहरहित योगी अकेला ही एकांत स्थान में स्थित होकर आत्मा को निरंतर परमात्मा में लगाए

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ध्यानयोग की प्रैक्टिस के लिए योगी के आदर्श स्थान और मानसिक स्थिति का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि योगी को हमेशा अपने मन को स्थिर रखने के लिए एकांत में रहना चाहिए। उसे एकाकी रहना चाहिए और अपने मन और आत्मा को संयमित रखना चाहिए। उसे निराशा और आसक्ति से मुक्त रहना चाहिए, और किसी भी प्रकार के संग्रह या संपत्ति की इच्छा नहीं करनी चाहिए। इस प्रकार की अवस्था में रहकर ही योगी अपने आत्म-ध्यान में संलग्न रह सकता है और आत्मज्ञान की प्राप्ति कर सकता है।