अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म

भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 23

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संस्कृत श्लोक

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्‌।

कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः॥

हिंदी अर्थ

जो साधक इस मनुष्य शरीर में, शरीर का नाश होने से पहले-पहले ही काम-क्रोध से उत्पन्न होने वाले वेग को सहन करने में समर्थ हो जाता है, वही पुरुष योगी है और वही सुखी है

सरल हिंदी व्याख्या

यह श्लोक योग और साधना की एक महत्वपूर्ण सिद्धि को इंगित करता है। इसमें भगवान श्री कृष्ण यह बता रहे हैं कि एक सच्चा योगी वही है जो इस जीवन में रहते हुए, शरीर के परित्याग से पहले, अपने भीतर के काम और क्रोध जैसे मानसिक वेगों को सहन करने में सक्षम होता है।

"शक्नोतीहैव यः सोढुं" – यहाँ 'इह' का अर्थ है इस संसार में, और 'शक्नोती' का मतलब है सहन करना। यह वाक्यांश संकेत करता है कि योगी को इस सांसारिक जीवन में ही अपने मनोवैज्ञानिक आवेगों को नियंत्रित करना होता है।

"प्राक्शरीरविमोक्षणात्" – 'प्राक्शरीरविमोक्षणात्' का अर्थ है शरीर के परित्याग के पूर्व। अर्थात, शरीर को छोड़ने से पहले। इसका तात्पर्य है कि साधक को मृत्यु से पूर्व ही इन वेगों पर नियंत्रण प्राप्त कर लेना चाहिए।

"कामक्रोधद्भवं वेगं" – 'काम' और 'क्रोध' से उत्पन्न होने वाले वेग। ये भावनाएँ आमतौर पर मनुष्य को अस्थिर कर देती हैं और साधना के मार्ग में बाधा डालती हैं।

"स युक्तः स सुखी नरः" – जो व्यक्ति इन वेगों को सफलतापूर्वक नियंत्रित कर लेता है, वह योगी (युक्त) और सुखी होता है।

इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से श्री कृष्ण ने यह सिखाया है कि वास्तविक योग और सुख की प्राप्ति के लिए, हमें सांसारिक इच्छाओं और क्रोध को काबू में करना आना चाहिए। यही सच्चे योगी और सुखी व्यक्ति की पहचान है।