अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः॥
हिंदी अर्थ
सर्वव्यापी परमेश्वर भी न किसी के पाप कर्म को और न किसी के शुभकर्म को ही ग्रहण करता है, किन्तु अज्ञान द्वारा ज्ञान ढँका हुआ है, उसी से सब अज्ञानी मनुष्य मोहित हो रहे हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि ईश्वर न तो किसी के पाप का आरोप लेता है और न ही किसी के अच्छे कर्मों का। भगवान विभु, अर्थात् विशाल और अनन्त, केवल ज्ञान का स्रोत हैं और पाप या पुण्य के कार्यों से प्रभावित नहीं होते हैं।
इस श्लोक का गहरा अर्थ यह है कि कर्मफल, अर्थात् पाप और पुण्य, व्यक्ति के अपने कर्मों के आधार पर होते हैं। भगवान श्रीकृष्ण इस तथ्य को उजागर कर रहे हैं कि सच्चे ज्ञान से ढंका हुआ अज्ञान ही लोगों को भ्रमित करता है। जब व्यक्ति का ज्ञान अवरुद्ध होता है, तब वह भ्रमित हो जाता है और जीवन की सच्चाई को समझने में असमर्थ होता है।
इस श्लोक का संदेश यह है कि ईश्वर सभी जीवों के कर्मों से परे हैं और कर्मों का फल, चाहे वह पाप हो या पुण्य, व्यक्ति के अपने कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है।
श्रीकृष्ण हमें यह समझाते हैं कि जीवन में वास्तविक सच्चाई और ज्ञान को प्राप्त करने के लिए अज्ञान के पर्दे को हटाना आवश्यक है। जब ज्ञान के प्रकाश से अज्ञान मिट जाता है, तब व्यक्ति वास्तविकता को समझ पाता है और भ्रमित नहीं होता।