अध्याय 5: कर्मयोग-कृष्णभावनाभावित कर्म
भगवद् गीता अध्याय 5, श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते।
हिंदी अर्थ
परमेश्वर मनुष्यों के न तो कर्तापन की, न कर्मों की और न कर्मफल के संयोग की रचना करते हैं, किन्तु स्वभाव ही बर्त रहा है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि ईश्वर का कर्मों के साथ कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है। वे न तो कर्मों के कर्ता हैं और न ही कर्मों को उत्पन्न करते हैं। यहाँ पर "प्रभु" से तात्पर्य भगवान से है, जो एक आदर्श स्थिति में होते हैं, जिसमें वे कर्मों में सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं करते।
मुख्य बिंदु:
कर्तृत्व की अनुपस्थिति: ईश्वर स्वयं कर्मों का कर्ता नहीं है। इससे यह सिखने को मिलता है कि कर्म करने का जिम्मा हम सभी पर है, और ईश्वर के लिए कर्मों का कोई व्यक्तिगत उत्तरदायित्व नहीं है।
स्वभाव का प्रभाव: कर्म और उनके फल स्वभाव के अनुसार स्वयं ही प्रवृत्त होते हैं। इसका मतलब है कि यह प्राकृतिक व्यवस्था है जो कर्मों और उनके परिणामों को निर्धारित करती है, न कि ईश्वर के किसी विशेष हस्तक्षेप से।
कर्मफल का संयोग: कर्मफल (अच्छे या बुरे परिणाम) भी भगवान द्वारा नहीं संजोया जाता, बल्कि ये सभी स्वभाव के अनुसार होते हैं।
इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि हमें अपने कर्मों को अपनी जिम्मेदारी मानते हुए निभाना चाहिए, और कर्मफल की चिंता को स्वभाव पर छोड़ देना चाहिए। यह जीवन के आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टिकोण को समझने में मदद करता है कि भगवान का असली कर्तव्य और भूमिका क्या है।