अध्याय 2: गीता का सार
भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 66
संस्कृत श्लोक
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
हिंदी अर्थ
न जीते हुए मन और इन्द्रियों वाले पुरुष में निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती और उस अयुक्त मनुष्य के अन्तःकरण में भावना भी नहीं होती तथा भावनाहीन मनुष्य को शान्ति नहीं मिलती और शान्तिरहित मनुष्य को सुख कैसे मिल सकता है?
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि जिसकी बुद्धि योग (आत्मसाक्षात्कार) से युक्त नहीं है, उसकी बुद्धि स्थिर नहीं हो सकती। जो व्यक्ति इंद्रियों और मन पर नियंत्रण नहीं रखता, वह कभी भी ध्यान (योग) में स्थिर नहीं हो सकता, और जो ध्यान में स्थिर नहीं हो सकता, वह सच्चे सुख और शांति का अनुभव नहीं कर सकता।
यहां "अयुक्त" का अर्थ है वह व्यक्ति जो इंद्रियों के नियंत्रण में है और जिसने मन को वश में नहीं किया है। ऐसे व्यक्ति के लिए स्थायी बुद्धि (समाधि) नहीं हो सकती। जो व्यक्ति मन को वश में नहीं कर सकता, उसकी भावना भी स्थिर नहीं हो सकती। और जिनकी भावना स्थिर नहीं है, वे शांति को प्राप्त नहीं कर सकते। शांति के अभाव में सुख की प्राप्ति असंभव है, क्योंकि जब मन अशांत होता है, तो व्यक्ति के लिए सुख की अनुभूति संभव नहीं हो सकती।
इस श्लोक का सार यह है कि योग (आत्म-नियंत्रण और ध्यान) के बिना, सच्ची शांति और सुख की प्राप्ति संभव नहीं है। इंद्रियों के नियंत्रण में रहकर व्यक्ति सच्चे सुख और शांति से वंचित रह जाता है। इसलिए, भगवान श्रीकृष्ण यहाँ आत्म-संयम, ध्यान, और योग के महत्व को समझा रहे हैं।