अध्याय 2: गीता का सार

भगवद् गीता अध्याय 2, श्लोक 65

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संस्कृत श्लोक

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते।

प्रसन्नचेतसो ह्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते॥

हिंदी अर्थ

अन्तःकरण की प्रसन्नता होने पर इसके सम्पूर्ण दुःखों का अभाव हो जाता है और उस प्रसन्नचित्त वाले कर्मयोगी की बुद्धि शीघ्र ही सब ओर से हटकर एक परमात्मा में ही भलीभाँति स्थिर हो जाती है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की शांति और प्रसन्नता के महत्व को बताते हैं। जब व्यक्ति के मन में प्रसन्नता और संतोष होता है, तो सभी प्रकार की दुखों से मुक्ति मिलती है।

विवेचना:

प्रसादे सर्वदुःखानां हानिरस्योपजायते - जब मनुष्य के मन में प्रसाद (आध्यात्मिक शांति और संतोष) उत्पन्न होता है, तब वह सभी प्रकार के दुखों से मुक्त हो जाता है। यहां 'प्रसाद' का तात्पर्य है आत्मिक शांति और संतोष, जो मन के स्थिरता और सुकून का सूचक है।

प्रसन्नचेतसो ह्याश्रु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते - जब व्यक्ति के मन में प्रसन्नता होती है, तब उसकी बुद्धि स्थिर रहती है। 'प्रसन्नचेतसो' का मतलब है खुशहाल मन और 'आश्रु बुद्धिः' का तात्पर्य है स्थिर और अस्थिर मन की बुद्धि, जो एकाग्रता और संतुलन को दर्शाती है।

यह श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है कि जब व्यक्ति का मन प्रसन्न और शांत होता है, तब उसकी सोच स्थिर रहती है और वह जीवन के कठिनाइयों का सामना सुसंगठित तरीके से कर सकता है। इस प्रकार, मन की प्रसन्नता और शांति व्यक्ति को सभी प्रकार की दुखों से मुक्त करती है और उसे सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।