अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 59
संस्कृत श्लोक
यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति॥
हिंदी अर्थ
जो तू अहंकार का आश्रय लेकर यह मान रहा है कि 'मैं युद्ध नहीं करूँगा' तो तेरा यह निश्चय मिथ्या है, क्योंकि तेरा स्वभाव तुझे जबर्दस्ती युद्ध में लगा देगा
सरल हिंदी व्याख्या
श्लोक 59 में भगवान कृष्ण अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि अहंकार और आत्म-रक्षा के बल पर कोई भी निर्णय लेना सही नहीं होता। यहाँ भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि अगर अर्जुन अपने अहंकार को आधार बना कर युद्ध से दूर रहना चाहता है, तो यह उसका निर्णय झूठा और असत्य है। क्योंकि उसके स्वभाव और कर्तव्य के अनुसार, उसे युद्ध में अवश्य भाग लेना पड़ेगा।
यह श्लोक इस बात को स्पष्ट करता है कि व्यक्ति का स्वभाव और उसकी अंतर्निहित प्रकृति उसकी जीवन की परिस्थितियों को नियंत्रित करती है, चाहे वह खुद कितनी भी कोशिश कर ले। अर्जुन का अहंकार उसे युद्ध से दूर रखने का प्रयास कर रहा है, लेकिन उसकी स्वभाविक प्रवृत्ति और कर्म के प्रति जिम्मेदारी उसे युद्ध में लाने के लिए मजबूर कर देगी। इस प्रकार, अहंकार की बजाय, व्यक्ति को अपने स्वभाव और कर्तव्यों को समझते हुए उचित निर्णय लेना चाहिए।