अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 60
संस्कृत श्लोक
स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा।
कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोऽपि तत्॥
हिंदी अर्थ
हे कुन्तीपुत्र! जिस कर्म को तू मोह के कारण करना नहीं चाहता, उसको भी अपने पूर्वकृत स्वाभाविक कर्म से बँधा हुआ परवश होकर करेगा
सरल हिंदी व्याख्या
हे कुन्तीपुत्र! इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि तुम्हारी स्वभाविक प्रवृत्तियाँ और तुम्हारे पूर्वजन्म के कर्मों की आदतें तुम्हें उस कार्य को करने के लिए बाध्य करेंगी, जिसे तुम अब मोह के कारण नहीं करना चाहते। यह तुम्हारे स्वभाव से जुड़ी हुई कर्म की आदत है और तुम चाहे जितना भी प्रयास कर लो, यह तुम्हारी अंतर्मन की शक्तियों और पूर्वकृत कर्मों के प्रभाव से तुम्हें उस कार्य को करना ही पड़ेगा।
अर्थात, जब एक व्यक्ति का स्वभाव किसी विशेष प्रकार के कार्य करने की आदत डालता है, तो वह व्यक्ति अनिच्छा के बावजूद भी अंततः वही कार्य करने के लिए विवश होता है। यह स्वाभाविक प्रवृत्तियों का प्रभाव है, जो मनुष्य को कर्म करने के लिए प्रेरित करती है, भले ही उसका मन न भी हो।
यह श्लोक कर्म की स्वाभाविकता और उसके अपरिहार्यता को दर्शाता है, जिसमें व्यक्ति का स्वभाव और पूर्वजन्म के कर्म उसकी वर्तमान स्थिति और कर्मों को निर्धारित करते हैं।