अध्याय 18: उपसंहार-संन्यास की सिद्धि
भगवद् गीता अध्याय 18, श्लोक 58
संस्कृत श्लोक
मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि।
अथ चेत्वमहाङ्कारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि॥
हिंदी अर्थ
उपर्युक्त प्रकार से मुझमें चित्तवाला होकर तू मेरी कृपा से समस्त संकटों को अनायास ही पार कर जाएगा और यदि अहंकार के कारण मेरे वचनों को न सुनेगा तो नष्ट हो जाएगा अर्थात परमार्थ से भ्रष्ट हो जाएगा
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं कि यदि तू पूरी तरह से मुझमें ध्यान लगाए रहेगा और मेरी कृपा को स्वीकार करेगा, तो तू सभी प्रकार के कष्टों और कठिनाइयों को आसानी से पार कर जाएगा। भगवान के अनुसार, जब व्यक्ति का मन पूरी तरह से ईश्वर में रमा रहता है, तो उनकी कृपा से सभी समस्याएँ हल हो जाती हैं और जीवन में सुख-समृद्धि प्राप्त होती है।
वहीं, यदि तू अहंकार के कारण भगवान के वचनों को नहीं सुनेगा और स्वयं की शक्ति पर निर्भर रहेगा, तो तू नष्ट हो जाएगा और तुझे वास्तविकता से विमुख होना पड़ेगा। अहंकार और आत्म-निर्भरता के कारण व्यक्ति भगवान के मार्गदर्शन से वंचित रह जाता है और उसका आत्मा की शांति और उन्नति की ओर बढ़ना मुश्किल हो जाता है।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण इस श्लोक के माध्यम से अर्जुन को सिखाते हैं कि ईश्वर की उपासना और उनकी कृपा को स्वीकार करना कितना महत्वपूर्ण है, और अहंकार से बचने की आवश्यकता है, ताकि जीवन में वास्तविक सफलता और शांति प्राप्त की जा सके।