अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग
भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 27
संस्कृत श्लोक
यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते।
कर्म चैव तदर्थीयं सदित्यवाभिधीयते॥
हिंदी अर्थ
तथा यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति है, वह भी 'सत्' इस प्रकार कही जाती है और उस परमात्मा के लिए किया हुआ कर्म निश्चयपूर्वक सत्-ऐसे कहा जाता है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने बताया है कि यज्ञ (अनुष्ठान), तप (आध्यात्मिक अनुशासन) और दान (सुख और समृद्धि के लिए दी गई सामग्री) में जो स्थिति होती है, उसे 'सत्' (सत्य) कहा जाता है। इसका अर्थ है कि इन पुण्य कार्यों की स्थिति और स्वभाव, जो सच्चाई और पवित्रता से युक्त होते हैं, उन्हें 'सत्' के रूप में परिभाषित किया जाता है।
यह श्लोक यह भी स्पष्ट करता है कि किसी भी कार्य, जो परमात्मा या उच्च उद्देश्य के लिए किया जाता है, उसे 'सत्' कहा जाता है। यहाँ 'सत्' का अर्थ है कि ऐसा कार्य न केवल धर्मपूर्ण है, बल्कि इसका उद्देश्य भी सत्य और ईश्वर की सेवा होता है।
इस प्रकार, यज्ञ, तप और दान में जो स्थिरता और निष्ठा है, वही सत्य की परिभाषा है। यह दर्शाता है कि धर्मपूर्ण कर्मों में निष्ठा और सजगता आवश्यक है, और ये सभी कर्म 'सत्' की श्रेणी में आते हैं क्योंकि ये ईश्वर और सत्य के प्रति समर्पित होते हैं।