अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग

भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 28

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संस्कृत श्लोक

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्‌।

असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान एवं तपा हुआ तप और जो कुछ भी किया हुआ शुभ कर्म है- वह समस्त 'असत्‌'- इस प्रकार कहा जाता है, इसलिए वह न तो इस लोक में लाभदायक है और न मरने के बाद ही

ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्री कृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोऽध्याय :

सरल हिंदी व्याख्या

हे अर्जुन! यहाँ पर भगवान श्री कृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी धार्मिक कार्य, जैसे हवन, दान, तपस्या, या कोई भी शुभ कर्म, उसे 'असत्' यानी अमान्य कहा जाता है। इसका मतलब है कि जब कोई कार्य श्रद्धा और विश्वास के बिना किया जाता है, तो उसका कोई सकारात्मक फल नहीं होता।

'असत्' का अर्थ है कि वह कार्य निष्फल, अनावश्यक या निरर्थक होता है। ऐसा कार्य न तो इस जीवन में किसी लाभ को दे सकता है और न ही मृत्यु के बाद किसी प्रकार के पुण्य या पुरस्कार को प्राप्त करवा सकता है। इसलिए, श्रद्धा के बिना किया गया कोई भी धार्मिक या शुभ कार्य अपने आप में निरर्थक है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्री कृष्ण हमें यह समझाते हैं कि केवल कर्म करना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि उन कर्मों में श्रद्धा और विश्वास होना भी आवश्यक है। श्रद्धा से किया गया कार्य ही सही अर्थ में फलदायी होता है और उसकी महत्ता है।

इस प्रकार, भगवान कृष्ण ने श्रद्धा और विश्वास के महत्व को स्पष्ट किया है और हमें सिखाया है कि सच्ची भक्ति और विश्वास के साथ ही किया गया कर्म सच्चा फल प्रदान करता है।