अध्याय 17: श्रद्धा के विभाग

भगवद् गीता अध्याय 17, श्लोक 26

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संस्कृत श्लोक

सद्भावे साधुभावे च सदित्यतत्प्रयुज्यते।

प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते॥

हिंदी अर्थ

'सत्‌'- इस प्रकार यह परमात्मा का नाम सत्यभाव में और श्रेष्ठभाव में प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ! उत्तम कर्म में भी 'सत्‌' शब्द का प्रयोग किया जाता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने 'सत्' शब्द के विभिन्न प्रयोगों पर प्रकाश डाला है। 'सत्' का अर्थ है 'सत्य' और 'श्रेष्ठता', और इसे आदर्श या उत्तम गुण वाले कार्यों और स्थितियों में प्रयोग किया जाता है।

सद्भाव: 'सत्' शब्द का प्रयोग उन स्थितियों और गुणों में किया जाता है जो सत्य और श्रेष्ठता को दर्शाते हैं। यह किसी भी कार्य, विचार, या व्यक्ति की शुद्धता और अच्छाई को व्यक्त करता है।

साधुभाव: इसी तरह, जब हम किसी व्यक्ति या कार्य की प्रशंसा करते हैं, या जब हम अच्छे और आदर्श गुणों का वर्णन करते हैं, तो 'सत्' शब्द का प्रयोग किया जाता है।

उत्तम कर्म: इसके अतिरिक्त, जब हम किसी कार्य की गुणता और उत्तमता की बात करते हैं, तो 'सत्' शब्द का प्रयोग होता है। उत्तम कर्म, जो धर्म और नैतिकता के अनुसार किया जाता है, भी 'सत्' के अंतर्गत आता है।

इस प्रकार, श्लोक यह स्पष्ट करता है कि 'सत्' शब्द का प्रयोग सत्य, श्रेष्ठता, और उत्तम कर्म की पहचान के लिए किया जाता है। यह ज्ञान हमें यह समझने में मदद करता है कि हमें अपने कार्य और सोच को 'सत्' के अनुसार निर्मित और संचालित करना चाहिए, ताकि वे ईश्वरीय गुणों से प्रेरित और उत्तम हो सकें।