अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
(जीवात्मा का विषय)
श्रीभगवानुवाच
ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनः षष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥
हिंदी अर्थ
इस देह में यह जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है (जैसे विभागरहित स्थित हुआ भी महाकाश घटों में पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, वैसे ही सब भूतों में एकीरूप से स्थित हुआ भी परमात्मा पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है, इसी से देह में स्थित जीवात्मा को भगवान ने अपना 'सनातन अंश' कहा है) और वही इन प्रकृति में स्थित मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है
सरल हिंदी व्याख्या
श्रीभगवान ने कहा है कि इस शरीर में स्थित जीवात्मा मेरा ही सनातन अंश है। जैसे कि एक ही आकाश को विभिन्न घटों में विभाजित किया जाता है, लेकिन आकाश स्वयं एक ही होता है, वैसे ही जीवात्मा भी मेरा एक अंश है, जबकि शरीर और मन के माध्यम से यह विभिन्न रूपों में प्रकट होता है। जीवात्मा अपनी प्रकृति के अनुसार, मन और पाँचों इन्द्रियों को आकर्षित करता है और उनके माध्यम से कार्य करता है।
विवरण:
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट कर रहे हैं कि जीवात्मा, जो कि हमारे शरीर में निवास करता है, वह भगवान का ही एक अविभाज्य हिस्सा है। जीवात्मा शाश्वत और अनन्त है, और इसे शरीर में स्थित मन और इन्द्रियों द्वारा संचालित किया जाता है। मन और इन्द्रियाँ जो भी कार्य करती हैं, जीवात्मा उन्हीं के माध्यम से अनुभव करता है।
भगवान इस श्लोक के माध्यम से हमें यह समझाना चाहते हैं कि जीवात्मा और परमात्मा के बीच एक गहरा सम्बन्ध है। जीवात्मा, जो कि एक दिव्य अंश है, मन और इन्द्रियों के माध्यम से इस भौतिक संसार के साथ जुड़ा रहता है। यह संसार में आकर्षण और विघटन का कारण बनता है, जो कि इस शरीर के माध्यम से अनुभव किया जाता है।
इस प्रकार, श्लोक 7 हमें यह सिखाता है कि हमें अपने भीतर के दिव्य अंश को पहचानना चाहिए और अपने मन और इन्द्रियों को सही दिशा में संकर्षित करना चाहिए ताकि हम आत्मा की वास्तविकता को समझ सकें और आत्मा के साथ परमात्मा के सम्बन्ध को जान सकें।