अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग

भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 6

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संस्कृत श्लोक

न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः।

यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥

हिंदी अर्थ

जिस परम पद को प्राप्त होकर मनुष्य लौटकर संसार में नहीं आते उस स्वयं प्रकाश परम पद को न सूर्य प्रकाशित कर सकता है, न चन्द्रमा और न अग्नि ही, वही मेरा परम धाम ('परम धाम' का अर्थ गीता अध्याय 8 श्लोक 21 में देखना चाहिए।) है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि वे परम धाम, जो न केवल अति दिव्य और अत्यंत दिव्य है, बल्कि जो संसार की आपत्तियों और सुख-दुखों से परे है। यह परम धाम उस स्थिति की ओर संकेत करता है, जहां पहुँचकर व्यक्ति इस संसार के पुनर्जन्म और कर्मफल के चक्र से मुक्त हो जाता है। इस धाम की विशेषता यह है कि यह न तो सूर्य, चंद्रमा या अग्नि के प्रकाश से प्रकाशित होता है, क्योंकि ये सब पदार्थिक (भौतिक) हैं और केवल सीमित परिधि में काम करते हैं।

सूरज, चंद्रमा और अग्नि सभी भौतिक शक्तियां हैं जो केवल इस संसार के जीवन को स्थायित्व प्रदान करती हैं, परंतु ये परम धाम उनके प्रकाश और प्रभाव से परे है। इसीलिए, यह परम धाम एक अनंत और निराकार स्थिति है, जो पूरी तरह से दिव्य और अद्वितीय है।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह समझाते हैं कि जो व्यक्ति इस परम धाम को प्राप्त कर लेता है, वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है और उसकी आत्मा भगवान के साथ शाश्वत रूप से मिल जाती है। इस धाम को प्राप्त करना संसार की अस्थिरता और अनिश्चितता से पार पाने का एक मार्ग है, जो एक स्थायी और परम शांति की अवस्था है।