अध्याय 15: पुरुषोत्तम योग
भगवद् गीता अध्याय 15, श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥
हिंदी अर्थ
वायु गन्ध के स्थान से गन्ध को जैसे ग्रहण करके ले जाता है, वैसे ही देहादिका स्वामी जीवात्मा भी जिस शरीर का त्याग करता है, उससे इन मन सहित इन्द्रियों को ग्रहण करके फिर जिस शरीर को प्राप्त होता है- उसमें जाता है
सरल हिंदी व्याख्या
जैसे वायु गंध को ग्रहण करके उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाती है, वैसे ही आत्मा भी शरीर को छोड़ने पर उन मन और इन्द्रियों को अपने साथ ले जाती है। जब आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में जाती है, तो वह उस नये शरीर में पुनः प्रवेश करती है।
इस श्लोक में श्री कृष्ण ने जीवन और मृत्यु के चक्र को समझाया है। यह दर्शाया गया है कि जैसे वायु गंध को ले जाती है, वैसे ही आत्मा शरीर को छोड़ने के बाद नई देह को ग्रहण करती है। यह प्रक्रिया पुनर्जन्म की ओर इशारा करती है, जहाँ आत्मा पुरानी देह को छोड़कर नई देह में प्रवेश करती है। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन की अस्थिरता और मृत्यु के बाद आत्मा का स्थानांतरण एक निरंतर प्रक्रिया है, और यह हमें जन्म और मृत्यु के रहस्यों को समझने में मदद करता है।