अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 4

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संस्कृत श्लोक

ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक्‌।

ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः॥

हिंदी अर्थ

यह क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का तत्व ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया है और विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया है तथा भलीभाँति निश्चय किए हुए युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को यह समझाने की कोशिश की है कि "क्षेत्र" (यानि भौतिक शरीर) और "क्षेत्रज्ञ" (यानि आत्मा या चेतना) का तत्व या सत्य केवल इस गीता में ही नहीं, बल्कि ऋषियों ने इसे बहुत पहले से ही अनेक प्रकार से कहा और समझाया है।

1. ऋषिभिर् बहुधा गीतं (ऋषियों द्वारा बहुत प्रकार से कहा गया): ऋषियों ने इस तत्व को भिन्न-भिन्न तरीकों से व्यक्त किया है। वेदों और उपनिषदों में ये विचार विभिन्न दृष्टिकोणों से प्रस्तुत किए गए हैं ताकि लोग इन्हें समझ सकें।

2. छन्दोभिर्विविधैः पृथक् (विविध वेदमन्त्रों द्वारा भी विभागपूर्वक कहा गया): वेदों में भी इस विषय को विभिन्न मन्त्रों और छंदों के माध्यम से अलग-अलग ढंग से वर्णित किया गया है। ये मन्त्र और छंद वेदों की विभिन्न शाखाओं में विस्तृत रूप से मिलते हैं।

3. ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः (युक्तियुक्त ब्रह्मसूत्र के पदों द्वारा भी कहा गया है): ब्रह्मसूत्र, जो वेदांत दर्शन का मुख्य ग्रंथ है, इसमें भी इस तत्व को तर्कसंगत और सुनिश्चित रूप में समझाया गया है। ब्रह्मसूत्र के पद या श्लोक इस बात की गहराई से पुष्टि करते हैं कि "क्षेत्र" और "क्षेत्रज्ञ" का तत्व क्या है।

निष्कर्ष: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह बताना चाहते हैं कि शरीर और आत्मा के विषय में जो ज्ञान वे अर्जुन को दे रहे हैं, वह एक नया ज्ञान नहीं है। यह ज्ञान सदियों से हमारे ऋषियों, वेदों और ब्रह्मसूत्रों में दिया गया है और इसे युक्ति और तर्क के आधार पर सिद्ध भी किया गया है। यह सत्य शाश्वत है और इसे अनेक माध्यमों से व्यक्त किया गया है।

यह श्लोक हमें यह समझने में मदद करता है कि आध्यात्मिक ज्ञान की जड़ें कितनी गहरी हैं और यह ज्ञान हमारे प्राचीन ग्रंथों में कितना समृद्ध और विस्तृत रूप से उपलब्ध है।