अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 5

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

महाभूतान्यहङ्‍कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च।

इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः॥

हिंदी अर्थ

पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि और मूल प्रकृति भी तथा दस इन्द्रियाँ, एक मन और पाँच इन्द्रियों के विषय अर्थात शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध

सरल हिंदी व्याख्या

श्लोक का अर्थ:

महाभूतानि: पाँच महाभूत या पंचमहाभूत हैं—पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, और आकाश। ये तत्व भौतिक जगत की संरचना के मूलभूत घटक हैं।

अहङ्कार: अहंकार का मतलब है "मैं" की भावना, जो जीव को उसके अस्तित्व के प्रति सजग रखता है। अहंकार व्यक्ति को उसके स्वभाव और कार्यों के प्रति जकड़े रखता है।

बुद्धि: बुद्धि का अर्थ है निर्णय शक्ति या विवेक, जो सही और गलत के बीच में अंतर करने में सहायक होती है।

अव्यक्तम्: अव्यक्त वह तत्व है जो प्रत्यक्ष नहीं है, परंतु सब कुछ उसी से उत्पन्न होता है। यह मूल प्रकृति है, जिसे कभी-कभी "माया" भी कहा जाता है।

इन्द्रियाणि: दस इन्द्रियाँ हैं—पाँच ज्ञानेंद्रियाँ (कान, त्वचा, आँख, जीभ, नाक) और पाँच कर्मेंद्रियाँ (हाथ, पैर, वाणी, गुदा, और जननेन्द्रिय)।

दशैकं: दस इन्द्रियों के साथ "एक" मन भी होता है, जो सभी इन्द्रियों का संयोजन और निर्देशन करता है।

पञ्च चेन्द्रियगोचराः: पाँच इन्द्रियों के विषय—शब्द, स्पर्श, रूप, रस, और गंध। ये विषय इन्द्रियों के माध्यम से अनुभव किए जाते हैं और जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

व्याख्या:

इस श्लोक में श्रीकृष्ण हमें सृष्टि के विभिन्न तत्वों की गहराई से जानकारी देते हैं। ये सभी तत्व "प्रकृति" का हिस्सा हैं, जिससे यह संसार चलता है। पाँच महाभूत इस भौतिक संसार के स्थूल तत्व हैं, जो हमारे आसपास की सभी वस्तुओं और जीवों का आधार हैं।

अहंकार और बुद्धि दो आंतरिक तत्व हैं, जो हमारे मानसिक और बौद्धिक स्तर पर कार्य करते हैं। अहंकार हमें हमारे "स्वयं" का बोध कराता है, जबकि बुद्धि हमें निर्णय लेने में सहायता करती है।

अव्यक्त वह अनजाना तत्व है, जो सब कुछ का मूल है, लेकिन स्वयं अव्यक्त रहता है। इसे सृष्टि की जड़ माना जाता है, जिससे सभी चीजें प्रकट होती हैं।

दस इन्द्रियाँ हमारे शरीर के संवेदी और क्रियात्मक अंग हैं, जो हमें बाहरी संसार से जोड़ते हैं। इन इन्द्रियों के माध्यम से हम दुनिया का अनुभव करते हैं और जीवन जीते हैं। मन इन इन्द्रियों का संयोजक और नियंत्रक है, जो हमें विभिन्न इन्द्रिय विषयों का अनुभव कराता है।

इस प्रकार, यह श्लोक हमें बताता है कि कैसे ये विभिन्न तत्व मिलकर इस संसार और हमारे जीवन का निर्माण करते हैं।