अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत्।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे श्रृणु॥
हिंदी अर्थ
वह क्षेत्र जो और जैसा है तथा जिन विकारों वाला है और जिस कारण से जो हुआ है तथा वह क्षेत्रज्ञ भी जो और जिस प्रभाववाला है- वह सब संक्षेप में मुझसे सुन
सरल हिंदी व्याख्या
श्लोक 3, अध्याय 13 में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के बारे में ज्ञान देने की शुरुआत करते हैं। इस श्लोक में श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे संक्षेप में अर्जुन को यह बताने वाले हैं कि क्षेत्र क्या है, इसका स्वरूप कैसा है, इसके विकार (परिवर्तन) क्या हैं, यह कैसे उत्पन्न होता है, और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) कौन है तथा उसका प्रभाव क्या है।
यहां श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि वे अब उन्हें ज्ञान का वह हिस्सा बताएंगे जो जीवन के रहस्यों को समझने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) का भेद जानना बहुत आवश्यक है क्योंकि यह भेद समझ में आने पर ही मनुष्य अपने सच्चे स्वरूप का अनुभव कर सकता है।
इस श्लोक का सार यह है कि संसार में जो कुछ भी होता है वह क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) की समझ पर निर्भर करता है। क्षेत्र का ज्ञान हमें भौतिक संसार और उसके सभी गुणों के बारे में बताता है, जबकि क्षेत्रज्ञ का ज्ञान आत्मा की शाश्वतता और उसकी अद्वितीयता का बोध कराता है। श्रीकृष्ण यह ज्ञान अर्जुन को संक्षेप में देने का वचन देते हैं ताकि अर्जुन इसे समझ सके और अपने जीवन में इसका सही उपयोग कर सके।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा और शरीर के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, जिससे वे जीवन के वास्तविक अर्थ को समझ सकें।