अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः ।
क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! जिस प्रकार एक ही सूर्य इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है, उसी प्रकार एक ही आत्मा सम्पूर्ण क्षेत्र को प्रकाशित करता है
सरल हिंदी व्याख्या
"यथा प्रकाशयत्येकः कृत्स्नं लोकमिमं रविः": इस भाग में भगवान श्रीकृष्ण यह संकेत कर रहे हैं कि सूर्य (रवि) एक ही प्रकाश के माध्यम से पूरे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है। सूर्य का प्रकाश सम्पूर्ण आकाश और पृथ्वी को एक समान तरीके से रोशन करता है, जिससे हर कोना उजागर हो जाता है।
"क्षेत्रं क्षेत्री तथा कृत्स्नं प्रकाशयति भारत": इसी प्रकार, एक ही आत्मा (क्षेत्री) सम्पूर्ण शरीर (क्षेत्र) को प्रकट करता है। आत्मा, जो कि हमारे भीतर का प्रकाश है, शरीर की सम्पूर्ण गतिविधियों और अनुभवों को रोशन करता है। यह आत्मा ही है जो सभी संवेदनाओं, विचारों और अनुभवों को स्पष्टता प्रदान करता है।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह दर्शाना चाहते हैं कि आत्मा, जैसा कि सूर्य का प्रकाश सम्पूर्ण विश्व को प्रकाशित करता है, वैसे ही आत्मा सम्पूर्ण शरीर और उसके अनुभवों को प्रकट और स्पष्ट करता है। आत्मा और शरीर के इस संबंध को समझना हमें जीवन की सच्चाई और आत्मज्ञान की ओर ले जाता है।