अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा ।
भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्॥
हिंदी अर्थ
इस प्रकार क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के भेद को (क्षेत्र को जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान तथा क्षेत्रज्ञ को नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी जानना ही 'उनके भेद को जानना' है) तथा कार्य सहित प्रकृति से मुक्त होने को जो पुरुष ज्ञान नेत्रों द्वारा तत्व से जानते हैं, वे महात्माजन परम ब्रह्म परमात्मा को प्राप्त होते हैं
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोगो नाम त्रयोदशोऽध्यायः
सरल हिंदी व्याख्या
"क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोरेवमन्तरं ज्ञानचक्षुषा": इस भाग में भगवान श्रीकृष्ण बता रहे हैं कि क्षेत्र (शरीर) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के बीच के भेद को समझना महत्वपूर्ण है। क्षेत्र (शरीर) जड़, विकारी, क्षणिक और नाशवान है, जबकि क्षेत्रज्ञ (आत्मा) नित्य, चेतन, अविकारी और अविनाशी है। ज्ञान की दृष्टि से इस भेद को पहचानना और समझना 'ज्ञानचक्षुषा' या ज्ञान के दृष्टिकोण से किया जाता है।
"भूतप्रकृतिमोक्षं च ये विदुर्यान्ति ते परम्": जो लोग इस भेद को जानने के साथ-साथ कार्यशील प्रकृति से मुक्ति को भी समझते हैं, वे वास्तव में परम ब्रह्म (परमात्मा) को प्राप्त होते हैं। यहाँ 'भूतप्रकृति' से मुक्ति का तात्पर्य है कि व्यक्ति प्राकृतिक गुणों और विकारों से पार हो जाता है और सच्चे ज्ञान को प्राप्त करता है।
इस श्लोक का सार यह है कि जो व्यक्ति आत्मा और शरीर के बीच के भेद को ज्ञान की दृष्टि से समझते हैं और इस समझ के आधार पर कार्यशील प्रकृति से मुक्त होते हैं, वे वास्तव में ब्रह्म (ईश्वर) को प्राप्त कर लेते हैं। यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि आत्मज्ञान और प्रकृति से मुक्ति के माध्यम से ही हम परम सत्य और ब्रह्म के साक्षात्कार की ओर बढ़ सकते हैं।