अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 32

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संस्कृत श्लोक

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते ।

सर्वत्रावस्थितो देहे तथात्मा नोपलिप्यते॥

हिंदी अर्थ

जिस प्रकार सर्वत्र व्याप्त आकाश सूक्ष्म होने के कारण लिप्त नहीं होता, वैसे ही देह में सर्वत्र स्थित आत्मा निर्गुण होने के कारण देह के गुणों से लिप्त नहीं होता

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्री कृष्ण आत्मा की प्रकृति को स्पष्ट कर रहे हैं। श्लोक के दो मुख्य बिंदुओं पर ध्यान केंद्रित किया गया है:

आकाश और आत्मा की तुलना: आकाश का गुण यह है कि वह सूक्ष्म और सर्वव्यापी होता है। इसलिए, आकाश का किसी भी वस्तु से संपर्क नहीं होता; वह न तो छूता है और न ही प्रभावित होता है। इसी प्रकार, आत्मा भी सभी स्थानों पर व्याप्त है लेकिन उसे शरीर के गुणों से कोई असर नहीं होता।

आत्मा का निर्गुण स्वरूप: जैसा कि आकाश किसी वस्तु के गुणों को नहीं अपनाता, आत्मा भी देह के गुणों और परिवर्तनों से प्रभावित नहीं होती। आत्मा का स्वभाव निर्गुण (गुण रहित) होता है, जो उसे देह के अनुभवों और गुणों से मुक्त करता है।

इस प्रकार, इस श्लोक में आत्मा की शुद्धता और अपरिवर्तनीयता को दर्शाया गया है, जो शरीर के भौतिक गुणों से परे रहती है। आत्मा का यह स्वभाव उसे शाश्वत और अविनाशी बनाता है, जबकि शरीर समय के साथ बदलता और समाप्त होता है।