अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 31

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संस्कृत श्लोक

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।

शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते॥

हिंदी अर्थ

हे अर्जुन! अनादि होने से और निर्गुण होने से यह अविनाशी परमात्मा शरीर में स्थित होने पर भी वास्तव में न तो कुछ करता है और न लिप्त ही होता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझा रहे हैं कि परमात्मा, जो अनादि (निरंतर) और निर्गुण (गुणों से रहित) है, वह अविनाशी है। इसका मतलब है कि परमात्मा के पास किसी भी प्रकार की उत्पत्ति, परिवर्तन या विनाश नहीं है।

भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि परमात्मा शरीर में निवास करते हुए भी वह न तो कुछ करता है और न ही किसी चीज से प्रभावित होता है। यहाँ 'न करोति' का अर्थ है कि परमात्मा किसी भी प्रकार की गतिविधि में भाग नहीं लेते, जबकि 'न लिप्यते' का मतलब है कि वह किसी भी अनुभव या क्रिया से प्रभावित नहीं होते।

इस प्रकार, परमात्मा की प्रकृति ऐसी है कि वह शरीर के भौतिक कार्यों और गुणों से परे है। वह सर्वत्र विद्यमान होते हुए भी इन भौतिक क्रियाओं से अलग रहते हैं। यह समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह स्पष्ट होता है कि सच्ची आत्मा और परमात्मा की पहचान भौतिकता से परे है और यह ब्रह्मा की सर्वोच्च स्थिति को दर्शाता है।

इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण यह भी स्पष्ट करते हैं कि जीवन की वास्तविकता को समझने के लिए हमें अपने मन और आत्मा की पहचान करनी चाहिए, न कि केवल भौतिक वस्तुओं और क्रियाओं को ही वास्तविकता मानना चाहिए।