अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! तू सब क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ अर्थात जीवात्मा भी मुझे ही जान (गीता अध्याय 15 श्लोक 7 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिए) और क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ को अर्थात विकार सहित प्रकृति और पुरुष का जो तत्व से जानना है (गीता अध्याय 13 श्लोक 23 और उसकी टिप्पणी देखनी चाहिए) वह ज्ञान है- ऐसा मेरा मत है
सरल हिंदी व्याख्या
श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि सभी क्षेत्रों में 'क्षेत्रज्ञ' यानी कि आत्मा, स्वयं भगवान ही हैं। यहाँ 'क्षेत्र' का अर्थ है शरीर या वह क्षेत्र जिसमें जीवन घटित होता है, और 'क्षेत्रज्ञ' वह है जो इस शरीर या क्षेत्र को जानता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि हर जीवात्मा में जो चेतना या आत्मा विद्यमान है, वह वास्तव में वे स्वयं हैं।
यह श्लोक यह भी बताता है कि 'क्षेत्र' और 'क्षेत्रज्ञ' के संबंध को समझना ही सच्चे ज्ञान का आधार है। 'क्षेत्र' अर्थात् प्रकृति और 'क्षेत्रज्ञ' अर्थात् पुरुष, इन दोनों का तत्व से ज्ञान होना ही वास्तविक ज्ञान है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो व्यक्ति इस सत्य को समझता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
इस श्लोक में श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि आत्मा या जीवात्मा, जिसे 'क्षेत्रज्ञ' कहा गया है, सभी प्राणियों में समान रूप से उपस्थित है और वही परमात्मा का स्वरूप है। इस तरह, वे अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि आत्मा और शरीर के बीच के अंतर को समझना ही सच्चे ज्ञान की पहचान है, और यह ज्ञान प्राप्त कर लेना ही वास्तविक आध्यात्मिक उन्नति है।
श्रीकृष्ण का यह मत है कि जो व्यक्ति इस भेद को समझ लेता है, वह जीवन के गहरे रहस्यों को समझने में सक्षम हो जाता है, और यह समझ उसे मोक्ष के मार्ग पर ले जाती है।