अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम्।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! यावन्मात्र जितने भी स्थावर-जंगम प्राणी उत्पन्न होते हैं, उन सबको तू क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही उत्पन्न जान
सरल हिंदी व्याख्या
हे अर्जुन! जितना भी स्थावर और जंगम सत्त्व, अर्थात् जीवों की विविधता उत्पन्न होती है, वह सब क्षेत्र (पृथ्वी) और क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के संयोग से उत्पन्न होती है। इसका तात्पर्य यह है कि सभी जीव और उनके विभिन्न रूप, चाहे वे स्थावर हों (जैसे पेड़-पौधे) या जंगम (जैसे मनुष्य और पशु), ये सभी क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के मिलन से उत्पन्न होते हैं।
यह श्लोक प्रकृति और आत्मा के बीच के संबंध को स्पष्ट करता है। 'क्षेत्र' अर्थात् शरीर या भौतिक जगत और 'क्षेत्रज्ञ' अर्थात् आत्मा या चेतना, दोनों का संगम ही जीवन और सत्त्व के सभी रूपों का निर्माण करता है।
टिप्पणी:
यह श्लोक हमें यह समझाने का प्रयास करता है कि जीवों की उत्पत्ति और उनके विविध रूप एक गहन आध्यात्मिक सत्य के परिणाम हैं, जहां भौतिक तत्व (क्षेत्र) और आध्यात्मिक तत्व (क्षेत्रज्ञ) का मिलन जीवन का आधार है। यह जीवन की प्रकृति को समझने में सहायक है और हमें यह भी बताता है कि सभी जीवों का अस्तित्व और उनके स्वरूप इन दोनों के संयोजन से है।