अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः॥
हिंदी अर्थ
परन्तु इनसे दूसरे अर्थात जो मंदबुद्धिवाले पुरुष हैं, वे इस प्रकार न जानते हुए दूसरों से अर्थात तत्व के जानने वाले पुरुषों से सुनकर ही तदनुसार उपासना करते हैं और वे श्रवणपरायण पुरुष भी मृत्युरूप संसार-सागर को निःसंदेह तर जाते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
अन्ये त्वेवमजानन्तः – यहाँ पर 'अन्ये' से अभिप्राय उन लोगों से है जो 'एवं' (उक्त) तत्त्वज्ञान को नहीं जानते। ये लोग शास्त्रों और उपदेशों के अनुसार वास्तविकता को समझने में असमर्थ होते हैं।
श्रुत्वान्येभ्य उपासते – ये लोग, जो खुद तत्त्वज्ञान को नहीं जानते, वे दूसरों से सुनी हुई बातों के आधार पर पूजा और उपासना करते हैं। यानी, वे सीधे तत्त्वज्ञान को नहीं समझते लेकिन वे उन बातों को मानते हैं जो उन्हें दूसरों से सुनने को मिलती हैं।
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं – भगवान कृष्ण कह रहे हैं कि ये लोग भी, जिनके पास तत्त्वज्ञान की गहराई नहीं है, फिर भी वे मृत्यु के महासागर को पार कर सकते हैं। इसका मतलब है कि यदि वे श्रवण और उपासना में लगे रहते हैं, तो वे अंततः मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।
श्रुतिपरायणाः – जो लोग सुनने और श्रवण में विश्वास रखते हैं, वे भी इस भौतिक संसार के दुख और मृत्यु के समुद्र से पार हो सकते हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक का तात्पर्य है कि तत्त्वज्ञान की गहराई में न जाकर भी अगर लोग श्रवण और उपासना में विश्वास रखते हैं, तो वे भी मुक्ति की प्राप्ति कर सकते हैं। यह दर्शाता है कि सही मार्ग पर चलने और भगवान के उपदेशों को मानने से, भले ही व्यक्ति ज्ञान की गहराई को न समझे, वे भी मोक्ष की प्राप्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।