अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 27

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्‌।

विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति॥

हिंदी अर्थ

जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है वही यथार्थ देखता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने हमें यह सिखाया है कि वास्तविक दृष्टि किसे कहा जा सकता है। यहाँ पर भगवान परमेश्वर की पहचान और उनका स्वरूप समझाने की कोशिश की जा रही है।

श्लोक का अर्थ: "जो पुरुष नष्ट होते हुए सब चराचर भूतों में परमेश्वर को नाशरहित और समभाव से स्थित देखता है, वही यथार्थ देखता है।"

व्याख्या:

"समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्": इसका तात्पर्य है कि परमेश्वर हर एक प्राणी, चाहे वह चल-फिर सकता हो या स्थिर हो, में एक समान रूप से स्थित हैं। वे सबके अंदर समभाव से स्थित रहते हैं, किसी भी भेदभाव के बिना।

"विनश्यत्स्वविनश्यन्तं": यहाँ पर परमेश्वर की स्थिरता और नाशरहितता का वर्णन किया गया है। संसार के सभी प्राणी और वस्तुएँ नाशवान हैं, लेकिन परमेश्वर नाशरहित हैं, वे सदा एक समान रहते हैं। वे कभी बदलते नहीं और नष्ट नहीं होते।

"यः पश्यति स पश्यति": जो व्यक्ति इस सच्चाई को समझता है कि परमेश्वर सब प्राणियों में एक समान रूप से विद्यमान हैं और वे नाशरहित हैं, वही वास्तव में 'देखता' है।

इस प्रकार, इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने हमें यह ज्ञान दिया है कि सच्ची दृष्टि वही है जो सभी प्राणियों में एक समान परमेश्वर को देखे और यह समझे कि वह नाशरहित और स्थिर हैं।

यह श्लोक हमें सिखाता है कि बाहरी रूप-रंग और भौतिक बदलावों से परे, परमेश्वर का वास्तविक स्वरूप नाशरहित और अनन्त है। यही सच्ची दृष्टि है।