अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 21

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संस्कृत श्लोक

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌।

कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु॥

हिंदी अर्थ

प्रकृति में (प्रकृति शब्द का अर्थ गीता अध्याय 7 श्लोक 14 में कही हुई भगवान की त्रिगुणमयी माया समझना चाहिए) स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न त्रिगुणात्मक पदार्थों को भोगता है और इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है। (सत्त्वगुण के संग से देवयोनि में एवं रजोगुण के संग से मनुष्य योनि में और तमो गुण के संग से पशु आदि नीच योनियों में जन्म होता है।)

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने पुरुष और प्रकृति के संबंध को स्पष्ट किया है। यहाँ पर "पुरुष" से तात्पर्य आत्मा से है, और "प्रकृति" से तात्पर्य प्रकृति की त्रिगुणमयी माया से है, जैसा कि गीता के अध्याय 7, श्लोक 14 में बताया गया है।

श्लोक की व्याख्या:

"पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्‍क्ते प्रकृतिजान्गुणान्‌": इस भाग का अर्थ है कि आत्मा (पुरुष) जब प्रकृति के साथ स्थित होता है, तो वह प्रकृति के त्रैगुणिक गुणों का अनुभव करता है। यहाँ "भुङ्‍क्ते" का मतलब है "भोगना" या "अनुभव करना"।

"कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु": इसका तात्पर्य है कि आत्मा के गुणों से संपर्क (संग) के कारण उसे विभिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है। यहाँ "सदसद्योनि" का अर्थ है "अच्छी और बुरी योनियाँ"।

सत्त्वगुण के संग: जब आत्मा का सत्त्वगुण प्रबल होता है, तो वह उच्च योनियों, जैसे देवयोनि, में जन्म लेता है। रजोगुण के संग: जब रजोगुण प्रबल होता है, तो आत्मा मनुष्य योनि में जन्म लेता है। तमो गुण के संग: जब तमोगुण प्रबल होता है, तो आत्मा नीच योनियों, जैसे पशु योनि, में जन्म लेता है। निष्कर्ष:

इस श्लोक के माध्यम से गीता यह बताती है कि आत्मा और प्रकृति का गहरा संबंध है। प्रकृति के त्रैगुणिक प्रभावों के कारण आत्मा को विभिन्न योनियों में जन्म लेना पड़ता है। ये गुण और उनके प्रभाव आत्मा के कर्मों और उसकी स्थिति पर निर्भर करते हैं।

इस प्रकार, इस श्लोक से यह भी समझ में आता है कि आत्मा का परिपूर्ण ज्ञान और योग साधना के माध्यम से प्रकृति के गुणों के प्रभाव से मुक्ति पाना संभव है।