अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 20

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संस्कृत श्लोक

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।

पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते॥

हिंदी अर्थ

कार्य (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी तथा शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गंध -इनका नाम 'कार्य' है) और करण (बुद्धि, अहंकार और मन तथा श्रोत्र, त्वचा, रसना, नेत्र और घ्राण एवं वाक्‌, हस्त, पाद, उपस्थ और गुदा- इन 13 का नाम 'करण' है) को उत्पन्न करने में हेतु प्रकृति कही जाती है और जीवात्मा सुख-दुःखों के भोक्तपन में अर्थात भोगने में हेतु कहा जाता है

सरल हिंदी व्याख्या

श्लोक 20 में प्रकृति और पुरुष के भेद को स्पष्ट किया गया है। इस श्लोक में मुख्यतः दो बातें बताई गई हैं:

प्रकृति का स्वरूप: श्लोक के अनुसार, 'प्रकृति' कार्य और करण के उत्पन्न होने का कारण होती है। यहाँ 'कार्य' से तात्पर्य उन तत्वों से है जो भौतिक सृष्टि का निर्माण करते हैं, जैसे आकाश, वायु, अग्नि, जल, और पृथ्वी। 'करण' से तात्पर्य उन इन्द्रियों और मनोवैज्ञानिक तत्त्वों से है जिनका उपयोग हम भौतिक और मानसिक अनुभव के लिए करते हैं, जैसे बुद्धि, अहंकार, मन, इन्द्रियाँ आदि। प्रकृति इन सभी तत्वों का निर्माण करने वाली ताकत है।

पुरुष का स्वरूप: 'पुरुष' यहाँ जीवात्मा को संदर्भित करता है, जो सुख और दुःख का अनुभव करता है। अर्थात, पुरुष (जीवात्मा) उन सभी भौतिक अनुभवों को भोगता है जो प्रकृति द्वारा उत्पन्न किए गए हैं।

इस प्रकार, श्लोक में स्पष्ट किया गया है कि प्रकृति और पुरुष की भूमिकाएँ अलग-अलग हैं। प्रकृति भौतिक और मनोवैज्ञानिक तत्त्वों का निर्माण करने वाली शक्ति है, जबकि पुरुष उन तत्त्वों के अनुभव और भोग में संलग्न रहता है।