अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 19
संस्कृत श्लोक
(ज्ञानसहित प्रकृति-पुरुष का विषय)
प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान्॥
हिंदी अर्थ
प्रकृति और पुरुष- इन दोनों को ही तू अनादि जान और राग-द्वेषादि विकारों को तथा त्रिगुणात्मक सम्पूर्ण पदार्थों को भी प्रकृति से ही उत्पन्न जान
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति और पुरुष के बारे में ज्ञान प्रदान कर रहे हैं। यहाँ प्रकृति और पुरुष को अनादि यानी असीमित काल से अस्तित्ववान माना गया है। इस श्लोक का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं और इनकी उत्पत्ति राग, द्वेष और अन्य विकारों के कारण होती है।
प्रकृति (प्रकृतिः): यह सृष्टि की मूल ऊर्जा है, जिसमें त्रिगुण - सत् (सत्व), रज (रजस) और तम (तामस) - होते हैं। ये गुण सभी भौतिक और मानसिक परिवर्तन, विकार, और वस्त्रों के आधारभूत होते हैं।
पुरुष (पुरुषः): यह आत्मा या परमात्मा का स्वरूप है, जो कि केवल साक्षी होता है और प्रकृति के साथ सहयोग करता है। पुरुष का अस्तित्व न तो जन्मा होता है और न ही नष्ट होता है।
विकार (विकारः): ये विकार, राग और द्वेष जैसी प्रवृत्तियाँ होती हैं, जो व्यक्ति की मानसिक स्थिति और स्वभाव को प्रभावित करती हैं।
श्लोक का सार: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण हमें यह समझा रहे हैं कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं और सभी परिवर्तनशीलता और गुण प्रकृति से उत्पन्न होते हैं। राग और द्वेष जैसे विकार भी प्रकृति के गुणों से ही उत्पन्न होते हैं, और यही गुण विभिन्न वस्तुओं और जीवों की विशेषताएँ निर्धारित करते हैं।
इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से, भगवान श्रीकृष्ण प्रकृति और पुरुष की अनादि प्रकृति और गुणों के आधार पर सभी भौतिक और मानसिक प्रक्रियाओं की व्याख्या करते हैं।