अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 1

पूरा अध्याय पढ़ें

संस्कृत श्लोक

(ज्ञानसहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय)

श्रीभगवानुवाच

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः॥

हिंदी अर्थ

श्री भगवान बोले- हे अर्जुन! यह शरीर 'क्षेत्र' (जैसे खेत में बोए हुए बीजों का उनके अनुरूप फल समय पर प्रकट होता है, वैसे ही इसमें बोए हुए कर्मों के संस्कार रूप बीजों का फल समय पर प्रकट होता है, इसलिए इसका नाम 'क्षेत्र' ऐसा कहा है) इस नाम से कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसको 'क्षेत्रज्ञ' इस नाम से उनके तत्व को जानने वाले ज्ञानीजन कहते हैं

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे हैं कि यह शरीर, जिसे हम देखते हैं, उसे 'क्षेत्र' कहा जाता है। 'क्षेत्र' का अर्थ होता है खेत। जैसे खेत में बीज बोए जाते हैं और समय आने पर वे फसल के रूप में प्रकट होते हैं, वैसे ही शरीर में किए गए कर्मों के बीज समय आने पर उनके परिणाम के रूप में प्रकट होते हैं। इसलिए शरीर को 'क्षेत्र' कहा गया है।

श्रीकृष्ण यह भी बताते हैं कि जो इस शरीर, या 'क्षेत्र' को जानता है, उसे 'क्षेत्रज्ञ' कहा जाता है। 'क्षेत्रज्ञ' वह व्यक्ति है जो इस शरीर के पीछे छिपे हुए सच्चे स्वरूप, अर्थात आत्मा या चेतना को जानता है। जो व्यक्ति यह समझ पाता है कि शरीर तो नश्वर है, परंतु उसके अंदर जो आत्मा है, वह अमर और अजर है, वही सच्चा ज्ञानी है। ज्ञानीजन इस सत्य को समझते हैं और इसीलिए वे शरीर और आत्मा के इस अंतर को जानते हुए जीते हैं।

इस श्लोक में श्रीकृष्ण ने शरीर और आत्मा के भेद को स्पष्ट किया है, जिससे यह समझा जा सके कि शरीर एक साधन मात्र है, और असली पहचान आत्मा की है, जो इस शरीर का साक्षी है।