अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 16

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संस्कृत श्लोक

अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌।

भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च॥

हिंदी अर्थ

वह परमात्मा विभागरहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर सम्पूर्ण भूतों में विभक्त-सा स्थित प्रतीत होता है (जैसे महाकाश विभागरहित स्थित हुआ भी घड़ों में पृथक-पृथक के सदृश प्रतीत होता है, वैसे ही परमात्मा सब भूतों में एक रूप से स्थित हुआ भी पृथक-पृथक की भाँति प्रतीत होता है) तथा वह जानने योग्य परमात्मा विष्णुरूप से भूतों को धारण-पोषण करने वाला और रुद्ररूप से संहार करने वाला तथा ब्रह्मारूप से सबको उत्पन्न करने वाला है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने परमात्मा की प्रकृति और उसके गुणों का वर्णन किया है। यहाँ पर बताया गया है कि परमात्मा सब जगह मौजूद है, लेकिन उसकी उपस्थिति एक अद्वितीय और अद्वितीय रूप में है। इस श्लोक को विस्तार से समझते हैं:

"अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितम्‌": यहाँ पर कहा गया है कि परमात्मा वस्तुतः विभक्त (अलग-अलग) नहीं है, बल्कि वह एक ही रूप में साक्षात् हर जगह मौजूद है। जैसे आकाश (ether) का कोई विभाजन नहीं होता, वह पूरे स्थान में समान रूप से फैला होता है, वैसे ही परमात्मा भी एकरूप और विभाजनहीन है।

हालांकि, इसी परमात्मा की उपस्थिति चराचर (सभी जीवित और निर्जीव वस्तुओं) में विभक्त (अलग-अलग) रूप में अनुभव होती है। उदाहरण के लिए, एक ही आकाश कई बर्तन (घड़े, बर्तन आदि) में विभाजित सा दिखता है, लेकिन वास्तव में वह एक ही आकाश होता है। इसी प्रकार, परमात्मा सब प्राणियों और वस्तुओं में बंटा हुआ प्रतीत होता है, लेकिन वास्तव में वह एक ही है।

"भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च": इस भाग में परमात्मा के तीन मुख्य गुणों का उल्लेख किया गया है:

"भूतभर्तृ": परमात्मा भूतों का पालनकर्ता है। वह सभी जीवों और वस्तुओं का संभार और पोषण करता है।

"ग्रसिष्णु": वह संहारक है। वह समय पर सबको समाप्त कर देता है, जिससे सृष्टि का पुनर्निर्माण संभव हो सके।

"प्रभविष्णु": वह सृष्टि का रचनाकार है। वह सब प्राणियों और वस्तुओं का निर्माण करता है।

इस प्रकार, इस श्लोक के माध्यम से श्रीकृष्ण ने परमात्मा के अद्वितीयता, उसकी सर्वव्यापकता और उसके गुणों को स्पष्ट किया है। परमात्मा एक ही रूप में सर्वत्र विद्यमान है, लेकिन उसकी उपस्थिति और प्रभाव विभक्त रूप में अनुभव होती है, और वह सभी जीवों के पालन, संहार, और सृष्टि का कर्ता है।