अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 15

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संस्कृत श्लोक

बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च।

सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं दूरस्थं चान्तिके च तत्‌॥

हिंदी अर्थ

वह चराचर सब भूतों के बाहर-भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर भी वही है। और वह सूक्ष्म होने से अविज्ञेय (जैसे सूर्य की किरणों में स्थित हुआ जल सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है, वैसे ही सर्वव्यापी परमात्मा भी सूक्ष्म होने से साधारण मनुष्यों के जानने में नहीं आता है) है तथा अति समीप में (वह परमात्मा सर्वत्र परिपूर्ण और सबका आत्मा होने से अत्यन्त समीप है) और दूर में (श्रद्धारहित, अज्ञानी पुरुषों के लिए न जानने के कारण बहुत दूर है) भी स्थित वही है

सरल हिंदी व्याख्या

"बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च": इस वाक्य में कहा जा रहा है कि परमात्मा चर और अचर सभी जीवों के भीतर और बाहर दोनों जगह व्याप्त है। अर्थात्, वह ब्रह्मा (अचर) और जीवों (चर) दोनों के स्वरूप में समाया हुआ है। इस प्रकार, परमात्मा सभी स्थितियों में मौजूद है, चाहे वह स्थिर वस्तुएं हों या गतिशील प्राणी।

"सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञयं": यहाँ पर सूक्ष्मता की बात की जा रही है। परमात्मा अत्यंत सूक्ष्म है, और इसलिए सामान्य मनुष्यों के लिए उसका ज्ञान प्राप्त करना कठिन है। जैसे सूर्य की किरणों में स्थित जल को सामान्य आँख से देखना कठिन होता है, वैसे ही परमात्मा की सूक्ष्मता के कारण उसका तात्त्विक स्वरूप मनुष्य की साधारण समझ से परे होता है।

"दूरस्थं चान्तिके च तत्‌": यह वाक्य बताता है कि परमात्मा न केवल निकटतम है बल्कि दूरस्थ भी है। भक्तों और ज्ञानी व्यक्तियों के लिए परमात्मा अति समीप है, जबकि अज्ञानी और श्रद्धारहित व्यक्तियों के लिए वह दूर लगता है। यह द्वैत और अद्वैत का भी संकेत है— परमात्मा एक ही समय में सभी जगह पर स्थित है, चाहे वह भौतिक रूप से समीप हो या दूर।

इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण हमें बताते हैं कि परमात्मा की उपस्थिति हर जगह है और उसकी पहचान केवल गहरे ध्यान और अंतर्दृष्टि के माध्यम से संभव है। वह सदा सबके समीप रहते हुए भी हमारी सामान्य समझ से परे रहते हैं।