अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते।
ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्॥
हिंदी अर्थ
वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति (गीता अध्याय 15 श्लोक 12 में देखना चाहिए) एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोधस्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने परमात्मा की स्थिति और उसके ज्ञान की प्रकृति को स्पष्ट किया है।
"ज्योतिषामपि तज्ज्योति": यहाँ पर 'ज्योति' का अर्थ है 'प्रकाश'। इस भाग में भगवान कहते हैं कि परमात्मा (परब्रह्म) सभी प्रकार की ज्योतियों (प्रकाशों) में भी सर्वोच्च ज्योति है। इसका मतलब यह है कि चाहे जो भी प्रकाश हो—सूरज की ज्योति, चाँद की ज्योति, या किसी और प्रकार का प्रकाश—सबमें सबसे श्रेष्ठ और ऊँची स्थिति वाला प्रकाश परमात्मा है।
"तमसः परमुच्यते": यहाँ पर 'तमस' का अर्थ है अंधकार। यह भाग कहता है कि परमात्मा अंधकार (अज्ञान) से भी परे है। वह अज्ञान, भ्रम, और माया से पूर्णतः मुक्त और स्वतंत्र है।
"ज्ञानं ज्ञेयं ज्ञानगम्यं": इस वाक्य में भगवान बताते हैं कि परमात्मा स्वयं ज्ञान है, ज्ञेयं (जिसे जानने योग्य है) और ज्ञान प्राप्ति के माध्यम से ज्ञेय (प्राप्त करने योग्य) है। परमात्मा ही वह तत्वज्ञान है जिसे जानना और समझना हमारे लिए संभव है।
"हृदि सर्वस्य विष्ठितम्": यहाँ पर यह कहा गया है कि परमात्मा सभी के हृदय में स्थित है। वह हर व्यक्ति के अंदर गहराई से व्याप्त है, वह किसी विशेष स्थान पर सीमित नहीं है।
संक्षेप में, इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि परमात्मा सच्चे ज्ञान का स्रोत है और हर प्राणी के हृदय में वास करता है। वह अज्ञान और माया से परे है और सभी प्रकार की ज्योतियों में सबसे ऊँचा है।