अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्।
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ च॥
हिंदी अर्थ
वह सम्पूर्ण इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है, परन्तु वास्तव में सब इन्द्रियों से रहित है तथा आसक्ति रहित होने पर भी सबका धारण-पोषण करने वाला और निर्गुण होने पर भी गुणों को भोगने वाला है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान की प्रकृति का वर्णन किया गया है। यहाँ कुछ मुख्य बिंदुओं की चर्चा की जा रही है:
सर्वेन्द्रियगुणाभासं: भगवान सब इन्द्रियों के गुणों को जानने वाले हैं, अर्थात् वे सभी इन्द्रियों की क्रियाओं और उनके प्रभावों का पूरा ज्ञान रखते हैं।
सर्वेन्द्रियविवर्जितम्: परन्तु वे स्वयं सभी इन्द्रियों से परे हैं। इसका अर्थ है कि भगवान स्वयं इन्द्रिय संबंधी नहीं हैं और उनके ऊपर इन्द्रियों का कोई प्रभाव नहीं होता।
असक्तं: भगवान को किसी भी वस्तु या घटना में आसक्ति नहीं होती। वे सब कुछ धारण करने के बावजूद किसी भी वस्तु से बंधे नहीं होते।
सर्वभृच्चैव: वे सम्पूर्ण सृष्टि को धारण करने वाले हैं। भगवान समस्त ब्रह्मांड और जीवों का पोषण और संरक्षण करते हैं।
निर्गुणं गुणभोक्तृ च: भगवान स्वयं निर्गुण होते हुए भी गुणों का अनुभव करते हैं। यानि कि वे गुणों से रहित हैं, फिर भी वे गुणों का भोग करते हैं और उनकी उपस्थिति का अनुभव करते हैं।
इस श्लोक का सार यह है कि भगवान का स्वरूप अपार, असीम और गुणों से परे है, लेकिन फिर भी वे समस्त सृष्टि का पालन करने वाले और गुणों का भोग करने वाले हैं। उनका यह गुण ही उनकी सर्वव्यापकता और पूर्णता को दर्शाता है।