अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा॥
हिंदी अर्थ
अध्यात्म ज्ञान में (जिस ज्ञान द्वारा आत्मवस्तु और अनात्मवस्तु जानी जाए, उस ज्ञान का नाम 'अध्यात्म ज्ञान' है) नित्य स्थिति और तत्वज्ञान के अर्थरूप परमात्मा को ही देखना- यह सब ज्ञान (इस अध्याय के श्लोक 7 से लेकर यहाँ तक जो साधन कहे हैं, वे सब तत्वज्ञान की प्राप्ति में हेतु होने से 'ज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान (ऊपर कहे हुए ज्ञान के साधनों से विपरीत तो मान, दम्भ, हिंसा आदि हैं, वे अज्ञान की वृद्धि में हेतु होने से 'अज्ञान' नाम से कहे गए हैं) है- ऐसा कहा है
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में अध्यात्म ज्ञान की परिभाषा और अज्ञान के विपरीत स्थिति को स्पष्ट किया गया है।
अध्यात्म ज्ञान वह ज्ञान है जो आत्मा (आध्यात्मिक आत्मा) और अनात्मा (माया या भौतिक संसार) के बीच का भेद समझने में सक्षम होता है। इस ज्ञान के द्वारा व्यक्ति सच्चे ब्रह्म (परमात्मा) के तत्व को समझता है और इस सच्चाई को अनुभव करता है। यह ज्ञान स्थायी और अपरिवर्तनीय है, क्योंकि यह आत्मा और ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को जानने में सहायक होता है।
इस श्लोक में कहा गया है कि इस ज्ञान को प्राप्त करना ही सही अर्थ में "ज्ञान" है। जो भी साधन या तरीके हमें इस तत्वज्ञान की प्राप्ति में सहायक होते हैं, वे सब ज्ञान की श्रेणी में आते हैं। इसके विपरीत, अगर हम किसी भी प्रकार के दम्भ, अहंकार, या हिंसा में लिप्त रहते हैं, तो यह अज्ञान को ही बढ़ावा देता है। अज्ञान वह है जो हमें सच्चे ज्ञान से दूर करता है और हमें भ्रमित करता है।
इस प्रकार, श्लोक का संदेश यह है कि सच्चा ज्ञान वही है जो हमें आत्मा और ब्रह्म के वास्तविक स्वरूप को समझने में सहायता करे, जबकि अज्ञान वह है जो हमें इस सच्चाई से दूर करता है।