अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
ज्ञेयं यत्तत्वप्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते॥
हिंदी अर्थ
जो जानने योग्य है तथा जिसको जानकर मनुष्य परमानन्द को प्राप्त होता है, उसको भलीभाँति कहूँगा। वह अनादिवाला परमब्रह्म न सत् ही कहा जाता है, न असत् ही
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान और सत्य के परम स्वरूप की व्याख्या कर रहे हैं। वे कहते हैं कि जो सत्य को जानने योग्य है, जिसे जानकर मनुष्य अमृत अर्थात् अनन्त सुख को प्राप्त करता है, वह परमब्रह्म है।
अर्थ:
ज्ञेयं यत्तत्त्वप्रवक्ष्यामि – यहाँ पर "ज्ञेयं" का मतलब है 'जो जानने योग्य है', और "तत्त्वप्रवक्ष्यामि" का अर्थ है 'मैं उसे स्पष्ट करूंगा'। भगवान कह रहे हैं कि मैं तुम्हें उस तत्त्व की जानकारी दूंगा जो जानने योग्य है।
यज्ज्ञात्वामृतमश्नुते – इसका मतलब है 'जिसे जानकर अमृत प्राप्त होता है'। यहाँ 'अमृत' का तात्पर्य है 'अनन्त सुख' या 'मुक्ति', जो केवल ज्ञान प्राप्त करने से ही मिलती है।
अनादिमत्परं ब्रह्म – 'अनादि' का मतलब है 'जिसका कोई प्रारंभ नहीं', और 'परं ब्रह्म' का अर्थ है 'परमात्मा'। यह दर्शाता है कि परमब्रह्म अनादि है, अर्थात् इसका कोई अंत या प्रारंभ नहीं है।
न सत्तन्नासदुच्यते – 'न सत्' और 'न असत्' का अर्थ है 'न सत्य' और 'न असत्य'। भगवान कहते हैं कि यह परमब्रह्म न तो सत्य है और न ही असत्य है, क्योंकि यह उसके पार है।
व्याख्या:
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण ने परमब्रह्म के स्वरूप को स्पष्ट किया है। वे बताते हैं कि यह परमब्रह्म न तो सत्त (सत्य) के दायरे में आता है और न ही असत्त (असत्य) के दायरे में। यह तत्त्व सर्वकालिक और अनन्त है, और इसे जानने से मनुष्य मोक्ष या अमृत प्राप्त करता है। यह ज्ञान का परिपूर्ण स्वरूप है जो जीवन की अंतिम और सर्वोत्तम उपलब्धि है।