अध्याय 13: प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
भगवद् गीता अध्याय 13, श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि॥
हिंदी अर्थ
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (केवल एक सर्वशक्तिमान परमेश्वर को ही अपना स्वामी मानते हुए स्वार्थ और अभिमान का त्याग करके, श्रद्धा और भाव सहित परमप्रेम से भगवान का निरन्तर चिन्तन करना 'अव्यभिचारिणी' भक्ति है) तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने भक्त के गुणों और उसके आचरण की विशेषताओं का वर्णन किया है। इसमें तीन मुख्य बिंदुओं को स्पष्ट किया गया है:
मुझ परमेश्वर में अनन्य योग द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति (मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी): यहाँ 'अव्यभिचारिणी भक्ति' का अर्थ है भगवान में अडिग और एकनिष्ठ भक्ति। इस प्रकार की भक्ति में कोई अन्य उद्देश्य या स्वार्थ नहीं होता। भक्त केवल भगवान को ही अपना स्वामी मानता है और उसकी भक्ति में कोई विचलन या परिवर्तन नहीं आता। यह भक्ति केवल भगवान की ओर ही केन्द्रित रहती है, और उसमें कोई भी अन्य सांसारिक लालसा, कामना, या व्यक्तिगत स्वार्थ नहीं होता।
विविक्तदेशसेवित्वम् (विविक्त देश में रहने का स्वभाव): विविक्त देश का अर्थ है एकांत और शुद्ध स्थान, जहाँ कोई व्यर्थ की बातों या सांसारिक प्रलोभनों से प्रभावित न हो। इस प्रकार का स्थान ध्यान और साधना के लिए उपयुक्त होता है। इस श्लोक में भगवान ने यह बताया है कि एक सच्चा भक्त एकांत में रहना पसंद करता है, जहाँ वह बिना किसी विक्षेप के भगवान का ध्यान कर सके और अपनी भक्ति को और गहन कर सके।
अरतिर्जनसंसदि (विषयासक्त मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का न होना): भगवान यहाँ यह कह रहे हैं कि सच्चे भक्त का मन उन लोगों के साथ नहीं लगता जो केवल सांसारिक भोग-विलास में ही लगे रहते हैं। विषयासक्त लोगों के साथ समय बिताने से भक्ति में रुकावटें आ सकती हैं, इसलिए सच्चा भक्त ऐसे समुदाय से दूर रहना चाहता है। वह उन लोगों के साथ रहना पसंद करता है जो भक्ति, साधना, और धर्म के मार्ग पर चलने वाले होते हैं।
इन तीन बिंदुओं से यह स्पष्ट होता है कि सच्चे भक्त के लिए भक्ति का मार्ग कितना पवित्र और निर्दोष होना चाहिए। उसे अपने मन और भावनाओं को एकनिष्ठता के साथ भगवान में समर्पित करना चाहिए, एकांत में रहकर अपने मन को साधना चाहिए, और सांसारिक प्रलोभनों और विषयासक्त समुदायों से दूर रहना चाहिए। इस प्रकार की भक्ति ही उसे परमात्मा के निकट पहुँचाती है।