अध्याय 12: भक्तियोग
भगवद् गीता अध्याय 12, श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
ये तु धर्म्यामृतमिदं यथोक्तं पर्युपासते।
श्रद्धाना मत्परमा भक्तास्तेऽतीव मे प्रियाः॥
हिंदी अर्थ
परन्तु जो श्रद्धायुक्त (वेद, शास्त्र, महात्मा और गुरुजनों के तथा परमेश्वर के वचनों में प्रत्यक्ष के सदृश विश्वास का नाम 'श्रद्धा' है) पुरुष मेरे परायण होकर इस ऊपर कहे हुए धर्ममय अमृत को निष्काम प्रेमभाव से सेवन करते हैं, वे भक्त मुझको अतिशय प्रिय हैं
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायांयोगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे भक्तियोगो नाम द्वादशोऽध्यायः
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने प्रिय भक्तों का वर्णन किया है। वह कहते हैं कि जो व्यक्ति उनके द्वारा बताए गए धर्मरूपी अमृत का पालन करता है, और श्रद्धा के साथ उनकी भक्ति में लीन रहता है, वह भगवान को अत्यंत प्रिय होता है।
यहां 'धर्मामृत' का अर्थ है वह शाश्वत सत्य और धर्म जो भगवान ने इस अध्याय में सिखाया है। इसमें बताया गया है कि कैसे एक व्यक्ति भगवान की भक्ति और सेवा के माध्यम से मुक्ति प्राप्त कर सकता है। इस श्लोक में भगवान विशेष रूप से उस भक्ति की महिमा का वर्णन कर रहे हैं, जो व्यक्ति श्रद्धा और विश्वास के साथ उनके प्रति करता है।
शब्द 'श्रद्दधाना' का अर्थ है वह व्यक्ति जो श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान की भक्ति करता है। 'मत्परमा' का अर्थ है वह व्यक्ति जो भगवान को अपने जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य मानता है।
भगवान श्रीकृष्ण यहां यह भी संकेत करते हैं कि भक्ति केवल बाहरी आचरण नहीं है, बल्कि यह श्रद्धा, विश्वास और पूर्ण समर्पण की आंतरिक भावना से जुड़ी है। जो भक्त इस प्रकार की भक्ति करते हैं, वे भगवान को सबसे अधिक प्रिय होते हैं। इस प्रकार की भक्ति में कोई भी दिखावा या बाहरी आडंबर नहीं होता; यह सच्चे हृदय से की गई भक्ति होती है।
निष्कर्ष: इस श्लोक का मुख्य संदेश यह है कि भगवान को वही भक्त प्रिय हैं, जो पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ उनकी बताई हुई शिक्षाओं का पालन करते हैं और अपने जीवन का मुख्य उद्देश्य भगवान की भक्ति को मानते हैं।