अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य
भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
मृत्युः सर्वहरश्चाहमुद्भवश्च भविष्यताम्।
कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा॥
हिंदी अर्थ
मैं सबका नाश करने वाला मृत्यु और उत्पन्न होने वालों का उत्पत्ति हेतु हूँ तथा स्त्रियों में कीर्ति (कीर्ति आदि ये सात देवताओं की स्त्रियाँ और स्त्रीवाचक नाम वाले गुण भी प्रसिद्ध हैं, इसलिए दोनों प्रकार से ही भगवान की विभूतियाँ हैं), श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति और क्षमा हूँ
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य ऐश्वर्य का वर्णन करते हैं। वे कहते हैं कि "मैं मृत्यु हूँ, जो सभी प्राणियों को समाप्त कर देती है। मैं संपूर्ण संसार की उत्पत्ति और भविष्यत की भी सत्ताधारी हूँ। मैं कीर्ति, श्री, और स्त्रियों की वाणी हूँ। मैं स्मृति, मेधा, धैर्य, और क्षमा भी हूँ।"
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण यह स्पष्ट करते हैं कि वे मृत्यु के रूप में अजर-अमर सृष्टि के अंत का कारण हैं। वे समस्त संसार के निर्माण और भविष्य की स्थिति के भी कारक हैं। भगवान की ये विशेषताएँ केवल संसार के भौतिक पहलुओं तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि वे दिव्य गुण भी हैं जो जीवन के विभिन्न पहलुओं को नियंत्रित करते हैं। कीर्ति, श्री, वाणी, स्मृति, मेधा, धैर्य और क्षमा – ये सभी गुण भगवान श्रीकृष्ण के विविध स्वरूपों में व्याप्त हैं, जो जीवन को संपूर्णता और सौंदर्य प्रदान करते हैं।