अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य
भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
अक्षराणामकारोऽस्मि द्वंद्वः सामासिकस्य च।
अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः॥
हिंदी अर्थ
मैं अक्षरों में अकार हूँ और समासों में द्वंद्व नामक समास हूँ। अक्षयकाल अर्थात् काल का भी महाकाल तथा सब ओर मुखवाला, विराट्स्वरूप, सबका धारण-पोषण करने वाला भी मैं ही हूँ
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण निम्नलिखित बातें कह रहे हैं:
अक्षराणामाकरोSस्मि – अक्षर अर्थात् जो शाश्वत और अविनाशी है, उसमें मैं ‘अ’ (अकार) हूँ। यानि, अक्षर और शाश्वतता का प्रतीक मैं हूँ।
द्वन्द्वः सामासिकस्य च – द्वंद्वों (जैसे दिन-रात, सुख-दुख) और सामासिकता (संयुक्तता) के संबंध में भी मैं ही उनका मूल कारण हूँ।
अहमेवाक्षयः कालो – मैं ही समय का अखंड और शाश्वत स्वरूप हूँ।
धाताहं विश्र्वतोमुखः – मैं ही समस्त धातुओं और तत्वों का स्त्रोत हूँ और समस्त दिशाओं में सर्वव्यापी हूँ।
इस प्रकार, भगवान श्रीकृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि वे ही अक्षर, द्वंद्व, समय और तत्वों के मूल स्वरूप हैं। वे सभी चीजों का आधार और सब कुछ में व्याप्त हैं।