अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य
भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम्।
मासानां मार्गशीर्षोऽहमृतूनां कुसुमाकरः॥
हिंदी अर्थ
तथा गायन करने योग्य श्रुतियों में मैं बृहत्साम और छंदों में गायत्री छंद हूँ तथा महीनों में मार्गशीर्ष और ऋतुओं में वसंत मैं हूँ
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने ऐश्वर्य को विभिन्न रूपों में प्रस्तुत करते हैं। वे कहते हैं, "मैं बृहत्साम (सामवेद के श्लोकों में से एक प्रकार) और सामवेद के श्लोकों में प्रमुख हूँ। मैं गायत्री छंद (एक प्रसिद्ध वेद मंत्र) में समाया हुआ हूँ। मासों में मैं मार्गशीर्ष (हिंदू कैलेंडर का एक महत्वपूर्ण मास) हूँ, और ऋतुओं में मैं वसंत (कुसुमों से भरी ऋतु) हूँ।"
यह श्लोक यह दर्शाता है कि भगवान श्रीकृष्ण सभी दिव्य तत्वों और धार्मिक आस्थाओं में विद्यमान हैं। वे वेदों की ऋचाओं में, छंदों में, महीनों और ऋतुओं में भी प्रकट होते हैं। इस प्रकार, श्रीकृष्ण की उपस्थिति सभी जगतों में और सभी जीवन के पहलुओं में व्यापक और अद्वितीय है।