अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य
भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम्।
सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः॥
हिंदी अर्थ
पुरोहितों में मुखिया बृहस्पति मुझको जान। हे पार्थ! मैं सेनापतियों में स्कंद और जलाशयों में समुद्र हूँ
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में श्रीकृष्ण तीन प्रमुख विषयों पर अपनी उपस्थिति और सर्वोच्चता को प्रकट करते हैं:
पुरोधाओं में बृहस्पति: पुरोहित या पुरोधा वह व्यक्ति होता है जो धार्मिक कर्मकांडों का नेतृत्व करता है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि पुरोहितों में बृहस्पति (देवताओं के गुरु) को उनका प्रतिनिधि समझा जाए। बृहस्पति को विद्या, धर्म और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। उनका नाम लेते हुए, श्रीकृष्ण बताते हैं कि वह ज्ञान और धर्म के मूल स्रोत हैं।
सेनानियों में स्कन्द: स्कन्द, जिन्हें कार्तिकेय या मुरुगन के नाम से भी जाना जाता है, युद्ध के देवता और देवताओं के सेनापति हैं। युद्ध में विजय और सामरिक कौशल के प्रतीक के रूप में, स्कन्द श्रीकृष्ण की शक्ति और पराक्रम का प्रतीक हैं। श्रीकृष्ण यह समझाना चाहते हैं कि सेना में जो सबसे प्रमुख और वीर है, वह स्वयं उनका अंश है।
जलाशयों में सागर: सागर या महासागर सभी जलाशयों में सबसे विशाल और गहरा है। यह संपूर्णता और गहराई का प्रतीक है। श्रीकृष्ण यह कहते हैं कि समस्त जलाशयों में सबसे बड़ा और शक्तिशाली सागर उनकी महिमा को दर्शाता है।
सार: श्रीकृष्ण इस श्लोक में अर्जुन को यह सिखा रहे हैं कि वे सृष्टि के हर महत्वपूर्ण और महानतम तत्व में विद्यमान हैं। उनका ऐश्वर्य और महिमा इस पूरे ब्रह्मांड के श्रेष्ठतम रूपों के माध्यम से प्रकट होती है। यह श्लोक भक्ति और श्रद्धा के महत्व को भी रेखांकित करता है, जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं कि उन्हें इस विश्व के सर्वश्रेष्ठ रूपों में देखा और पूजा जाना चाहिए।