अध्याय 10: श्री भगवान् का ऐश्वर्य

भगवद् गीता अध्याय 10, श्लोक 25

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संस्कृत श्लोक

महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम्‌।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः॥

हिंदी अर्थ

मैं महर्षियों में भृगु और शब्दों में एक अक्षर अर्थात्‌‌ ओंकार हूँ। सब प्रकार के यज्ञों में जपयज्ञ और स्थिर रहने वालों में हिमालय पहाड़ हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

श्रीकृष्ण कहते हैं कि महर्षियों में मैं भृगु हूँ। भृगु ऋषि महान तपस्वी और ज्ञान के प्रतीक माने जाते हैं। वे सप्तऋषियों में से एक हैं और ऋषियों के प्रमुख हैं। यहाँ भगवान यह कहना चाहते हैं कि जिन महर्षियों में भृगु श्रेष्ठ हैं, उन्हीं की तरह वे स्वयं भी सर्वश्रेष्ठ हैं।

यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि स्थावराणां हिमालयः || श्रीकृष्ण कहते हैं कि यज्ञों में मैं जप यज्ञ हूँ। यज्ञ का अर्थ है भगवान की आराधना और इसमें जप यज्ञ को सर्वोत्तम माना गया है। जप यज्ञ वह यज्ञ है जिसमें व्यक्ति मंत्रों का जप करके भगवान का ध्यान करता है।

स्थावरों (अचल वस्तुओं) में, मैं हिमालय हूँ। हिमालय पर्वत संसार के सबसे बड़े पर्वतों में से एक है, और इसका एक विशेष स्थान है। यह अपनी स्थिरता, ऊँचाई, और अटलता के लिए जाना जाता है। भगवान यहाँ यह बताना चाहते हैं कि स्थिरता और दृढ़ता के प्रतीक के रूप में वे हिमालय के समान हैं।

सारांश: इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपने विभिन्न रूपों और अभिव्यक्तियों को बताते हैं। वे महर्षियों में भृगु के रूप में, शब्दों में ओंकार के रूप में, यज्ञों में जप यज्ञ के रूप में, और स्थावरों में हिमालय के रूप में अपने ऐश्वर्य का वर्णन कर रहे हैं। इस श्लोक का उद्देश्य भक्तों को यह समझाना है कि भगवान हर श्रेष्ठता में समाहित हैं, और जो कुछ भी महान और उत्कृष्ट है, वह भगवान का ही रूप है।