अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण
भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
संकरो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः॥
हिंदी अर्थ
वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। लुप्त हुई पिण्ड और जल की क्रिया वाले अर्थात श्राद्ध और तर्पण से वंचित इनके पितर लोग भी अधोगति को प्राप्त होते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में अर्जुन अपनी चिंता और शोक को प्रकट कर रहे हैं कि युद्ध में भाग लेने से कुल की मान्यता और धर्म नष्ट हो जाएंगे। उन्होंने यह कहा है कि जो दोष और पाप कुल के नाश का कारण बन सकते हैं, वे वर्णाश्रम के नियमों के उल्लंघन के परिणामस्वरूप उत्पन्न होते हैं। इन दोषों से जाति और कुल के धर्म जो शाश्वत हैं, वे समाप्त हो जाएंगे।
अर्जुन इस श्लोक के माध्यम से यह समझाते हैं कि यदि कुलधर्म और जातिधर्म की रक्षा नहीं की जाती है, तो उन पापों के कारण जो कुल की स्थिति को खतरे में डाल सकते हैं, धर्म और कुल की पहचान का नाश हो जाएगा। उन्होंने अपने मन में यह चिंता व्यक्त की है कि युद्ध के परिणामस्वरूप कुल और जाति के धर्मों का निराधार हो जाना न केवल समाज की व्यवस्था को खतरे में डालेगा बल्कि सम्पूर्ण धर्म का विनाश भी करेगा।
इस प्रकार, अर्जुन ने युद्ध के विनाशकारी प्रभावों को उजागर करते हुए धर्म और कुल की स्थिरता की महत्वता को व्यक्त किया है।