अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण

भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 41

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संस्कृत श्लोक

अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः।

स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः॥

हिंदी अर्थ

हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ अत्यन्त दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय! स्त्रियों के दूषित हो जाने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में, कर्ण का स्पष्ट तात्पर्य है कि जो लोग अपने कुल को नष्ट कर देते हैं, उनके पूर्वज नरक में जाते हैं। ये पूर्वज उस परिवार की पिंड-क्रिया (पिंडदान) और जल-क्रिया (तर्पण) से वंचित हो जाते हैं।

यह श्लोक एक सामाजिक और धार्मिक दृष्टिकोण को उजागर करता है, जिसमें कहा गया है कि कुल का विनाश केवल परिवार की हानि नहीं होती, बल्कि पूर्वजों की आत्मा को भी दुख पहुँचाता है। पिंडदान और तर्पण जैसे कर्म पूर्वजों की आत्मा की शांति और सुख के लिए किए जाते हैं। जब परिवार और कुल का विनाश होता है, तो ये धार्मिक कृत्य भी ठप हो जाते हैं, जिससे पूर्वजों को पिंडदान और तर्पण का लाभ नहीं मिल पाता।

इस प्रकार, श्लोक यह दर्शाता है कि कुलधर्म और पारंपरिक धार्मिक कृत्यों का पालन न करना एक गंभीर दोष है, और इसके परिणामस्वरूप न केवल वर्तमान पीढ़ी को, बल्कि पूर्वजों को भी कष्ट उठाना पड़ता है।