अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण

भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 30

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संस्कृत श्लोक

गाण्डीवं स्रंसते हस्तात्वक्चैव परिदह्यते।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः॥

हिंदी अर्थ

हाथ से गांडीव धनुष गिर रहा है और त्वचा भी बहुत जल रही है तथा मेरा मन भ्रमित-सा हो रहा है, इसलिए मैं खड़ा रहने को भी समर्थ नहीं हूँ

सरल हिंदी व्याख्या

अर्जुन इस श्लोक में यह व्यक्त कर रहे हैं कि वे युद्धभूमि पर स्थिर रहने में असमर्थ हैं और उनके मन की स्थिति भ्रमित और अस्थिर हो रही है। वे कहते हैं कि वे सही से निर्णय नहीं ले पा रहे हैं, और उनका मन भ्रमित हो रहा है जैसे कि किसी प्रकार के भ्रम में हो। वे देख रहे हैं कि जो संकेत और चिन्ह युद्ध के लिए सामान्य होते हैं, वे उलटे और विपरीत प्रतीत हो रहे हैं।

यह श्लोक अर्जुन की मानसिक स्थिति को उजागर करता है, जिसमें वे न केवल शारीरिक रूप से बल्कि मानसिक रूप से भी अस्थिर महसूस कर रहे हैं। यह स्थिति उनके द्वारा देखे जा रहे संकेतों और परिस्थितियों के विपरीत होने की वजह से उत्पन्न हो रही है। अर्जुन की यह अवस्था उनके भीतर की चिंता और अशांति को दर्शाती है, जो कि युद्ध की गंभीरता और उस समय की दुविधा को प्रकट करती है।