अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण

भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 28–29

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संस्कृत श्लोक

(मोह से व्याप्त हुए अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचन )

अर्जुन उवाच

दृष्टेवमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम्‌॥

सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति।

वेपथुश्च शरीरे में रोमहर्षश्च जायते॥

हिंदी अर्थ

अर्जुन बोले- हे कृष्ण! युद्ध क्षेत्र में डटे हुए युद्ध के अभिलाषी इस स्वजनसमुदाय को देखकर मेरे अंग शिथिल हुए जा रहे हैं और मुख सूखा जा रहा है तथा मेरे शरीर में कम्प एवं रोमांच हो रहा है ॥28वें का उत्तरार्ध और 29॥

सरल हिंदी व्याख्या

इस श्लोक में अर्जुन अपने गहरे शोक और चिंता को व्यक्त कर रहा है। युद्धभूमि पर अपने ही कुटुंबियों और मित्रों को सैन्यबल के रूप में देखकर अर्जुन अत्यंत उदास और भयभीत हो जाता है। उसके अंगों में कंप और मुख में सूखापन उसकी मानसिक स्थिति को प्रकट करते हैं। यह स्थिति अर्जुन की मनोवैज्ञानिक संघर्ष और युद्ध के नैतिकता को लेकर उलझन को दर्शाती है, जो उसके मन में आ रही असहायता और चिंता को प्रकट करती है। अर्जुन की यह अवस्था इस बात को दिखाती है कि युद्ध की परिस्थितियों में व्यक्ति किस प्रकार अपनी भावनाओं और रिश्तों के प्रति संवेदनशील हो जाता है।

"इस श्लोक में अर्जुन ने अपनी व्यथा और असमर्थता का वर्णन किया है, जब उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि को देखा। यहाँ पर अर्जुन कह रहे हैं कि उनके शरीर में वेपथु (अधिक चंचलता) और रोमांच (रोम-रोम में सिहरन) हो रहा है।

श्लोक का भावार्थ है: ""मेरे शरीर में एक अजीब सी चंचलता और रोमांच उत्पन्न हो रहा है। मेरी अंगुलियों से गाण्डीव (धनुष) गिर रहा है, और मेरी त्वचा भी जल रही है।""

अर्जुन के इस श्लोक में उनके भीतर उठ रही चिंता, भय और तनाव को व्यक्त किया गया है। युद्ध की तैयारी और उसका भय अर्जुन के शरीर और मन दोनों पर प्रभाव डाल रहा है। उनके हाथ से धनुष गिर रहा है, और उन्हें लगता है कि उनकी त्वचा जल रही है, जो युद्ध के प्रति उनके मनोवैज्ञानिक तनाव को दर्शाता है। यह श्लोक युद्ध के प्रारंभिक स्थिति में अर्जुन की मानसिक स्थिति को स्पष्ट करता है और दर्शाता है कि वह युद्ध के परिणाम और इसके प्रभाव को लेकर अत्यंत चिंतित हैं।"