अध्याय 1: कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्य निरिक्षण
भगवद् गीता अध्याय 1, श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव।
न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे॥
हिंदी अर्थ
हे केशव! मैं लक्षणों को भी विपरीत ही देख रहा हूँ तथा युद्ध में स्वजन-समुदाय को मारकर कल्याण भी नहीं देखता
सरल हिंदी व्याख्या
इस श्लोक में अर्जुन अपने मन की स्थिति को व्यक्त कर रहे हैं। वह कह रहे हैं कि युद्ध में अपने स्वजनों को मारने से कोई भी श्रेष्ठता (श्रेय) उन्हें दिखाई नहीं देती। उनके मन में इस बात की कोई इच्छा नहीं है कि वह कृष्ण की सहायता से युद्ध जीतें या राज्य और सुख प्राप्त करें।
अर्जुन का यह विचार गहरी निराशा और असहायता को दर्शाता है। वह अपने कुटुम्बियों और प्रियजनों के मरने के विचार से अत्यंत दुखी हैं और उन्हें यह युद्ध की विजय या राज्य की प्राप्ति भी महत्वहीन लगती है।
यह श्लोक उस भीषण संघर्ष की मनोवैज्ञानिक स्थिति को दर्शाता है जिसमें अर्जुन अपने कर्तव्यों और नैतिक दायित्वों के बीच बुरी तरह फंसे हुए हैं। उनका यह भावनात्मक संकट युद्ध की वास्तविकता और मानवता की जटिलताओं को उजागर करता है।