अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
( जगत की उत्पत्ति का विषय )
सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम्।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥
हिंदी अर्थ
हे अर्जुन! कल्पों के अन्त में सब भूत मेरी प्रकृति को प्राप्त होते हैं अर्थात् प्रकृति में लीन होते हैं और कल्पों के आदि में उनको मैं फिर रचता हूँ
सरल हिंदी व्याख्या
यह श्लोक हमें बताता है कि सृष्टि का निर्माण और उसका विनाश एक निरंतर प्रक्रिया है। प्रत्येक प्राणी, चाहे वह जीवित हो या मृत, भगवान की प्रकृति में समाहित होता है। जब एक सृजनकाल समाप्त होता है, तो सभी प्राणी भगवान की प्रकृति में वापस चले जाते हैं और फिर से एक नए सृजनकाल में पुनः उत्पन्न होते हैं।
यह प्रक्रिया न केवल प्राणियों के लिए बल्कि पूरे ब्रह्मांड के लिए भी लागू होती है। यह चक्र निरंतर चलता रहता है, और भगवान ही इसका कर्ता है।
इस श्लोक के माध्यम से श्री कृष्ण ने यह स्पष्ट किया है कि प्रकृति और प्राणी सृजन और संहार की निरंतर प्रक्रिया के अधीन हैं, और भगवान इस समस्त प्रक्रिया का नियंत्रण और संचालन करते हैं। यह विचार हमें जीवन के चक्रीय स्वभाव को समझने में मदद करता है और हमें यह सीखने की प्रेरणा देता है कि सृष्टि के इस अनंत चक्र का भाग होते हुए भी हमें अपने कर्मों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।