अध्याय 9: परम गुह्य ज्ञान
भगवद् गीता अध्याय 9, श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
( सकाम और निष्काम उपासना का फल)
त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापायज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते।
ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकमश्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान्॥
हिंदी अर्थ
तीनों वेदों में विधान किए हुए सकाम कर्मों को करने वाले, सोम रस को पीने वाले, पापरहित पुरुष (यहाँ स्वर्ग प्राप्ति के प्रतिबंधक देव ऋणरूप पाप से पवित्र होना समझना चाहिए) मुझको यज्ञों के द्वारा पूजकर स्वर्ग की प्राप्ति चाहते हैं, वे पुरुष अपने पुण्यों के फलरूप स्वर्गलोक को प्राप्त होकर स्वर्ग में दिव्य देवताओं के भोगों को भोगते हैं
सरल हिंदी व्याख्या
श्रीकृष्ण इस श्लोक में यह बताना चाहते हैं कि जो लोग वेदों के ज्ञाता हैं और यज्ञों के द्वारा पवित्रता प्राप्त करके स्वर्गलोक की प्राप्ति की कामना करते हैं, वे स्वर्ग लोक में जाकर वहाँ के दिव्य सुखों का आनंद लेते हैं। लेकिन यह आनंद स्थायी नहीं है, यह पुण्य समाप्त होने के बाद पुनः समाप्त हो जाता है। इसलिए श्रीकृष्ण अर्जुन को यह समझाना चाहते हैं कि स्थायी और परम सुख प्राप्त करने के लिए केवल यज्ञ और कर्मकांड से परे जाकर भगवान की भक्ति और ज्ञान का मार्ग अपनाना चाहिए।
इस प्रकार यह श्लोक यज्ञ और कर्मकांडों के फलस्वरूप प्राप्त होने वाले स्वर्गीय सुख की अस्थिरता को इंगित करता है और स्थायी, परम सुख के लिए भक्ति मार्ग को श्रेष्ठ बताता है।